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हिन्दी साहित्य और गााँधीिाद

पश्चिमी सभ्यता के वर्चस्व वाले उस युग में गाँधी ने भारतीय सभ्यता को श्रेष्ठ बताते हुए, उसे सम्पूर्ण विश्व के लिए एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है। रामधारी सिंह दिनकर ने गाँधी के बारे में उचित ही लिखा है- “एक देश में बांध संकुचित करो न इसको गांधी का कर्तव्य क्षेत्र, दिक् नहीं, काल है गाँधी है कल्पना जगत के अगले युग की गाँधी मानवता का अगला उद्विकास है
हिन्दी साहित्य और गाँधीवाद
गाँधीवाद का प्रभाव समाज, साहित्य और राजनीति पर ही नही बल्कि जीवन के अधिकांश क्षेत्रों पर पड़ता है। गाँधी जी के चिंतन के प्रमुख तत्व है- सत्य, अहिंसा, मानवतावाद, लोककल्याण शांति, सद्भावना, सर्वोदय तथा भाईचारा |
इन तत्वों की अभिव्यक्ति हिंदी साहित्य के सभी विधाओं में अलग-अलग स्वरूपों में, विभिन्न कालों में अनेक बार हुआ अनेक साहित्यकार गाँधीवादी चिंतन से प्रत्यक्षतः या परोक्ष रूप से प्रभावित हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन के समय गाँधीवादी दर्शन से न सिर्फ लोकमानस प्रभावित हुआ, बल्कि अनेक साहित्यकार ने भी महात्मा गाँधी के विचारों को अपनी रचनाओं में जगह दी। हिंदी साहित्य में सर्वप्रथम द्विवेदीयुगीन काव्यधारा में महात्मा गाँधी के विचारों को अपनी रचनाओं में जगह दी। हिंदी साहित्य में सर्वप्रथम मैथलीशरण गुप्त तथा सियाराम शरण गुप्त ने इनके विचारों को आत्मसात किया। वे इनसे विशेष रूप से प्रभावित थे। मैथलीशरण गुप्त ने गाँधी जी के भाषायी विचारों को भी आत्मसात किया तथा भाषा की सरलता पर बल दिया। सियारामशरण गुप्त का गाँधीवाद में अटूट आस्था थी इसलिए
उनकी सभी रचनाओं पर अहिंसा, सत्य, करुणा, विश्वबंधुत्व शांति आदि गाँधीवादी मूल्यों का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। हिन्दी साहित्य के छायावाद युग इस विचारधारा से काफी हद तक प्रभावित रहा। जयशंकर प्रसाद की कामायनी, सुमित्रानंदन पंत की अनेक रचनाएँ गाँधीवाद से प्रभावित हैं छायावाद युग आजादी के भावों से युक्त कविताओं पर गाँधी दर्शन का गंभीर प्रभाव है। सुमित्रानंदन पंत ने गाँधी जी को संबोधित करते हुए लिखा हैं –

तुम मांस-हीन, तुम रक्त-हीन,

हे अस्थि-शेष! तुम अस्थि हीन,
तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल,

हे चिर पुराण, हे चिर नवीन !

तुम पूर्ण इकाई जीवन की,

जिसमें असार भव- शून्य लीन,

आधार अमर होगी, जिस पर,

भावी की संस्कृति समासीन !

इसके बाद प्रगतिवादी काव्यधारा में भी गाँधी जी का प्रभाव दिखता है। भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएँ विशेष रूप से गाँधी चिन्तन से प्रभावित है। इन्होंने गाँधी जी के हिन्दुस्तानी भाषा को आत्मसात किया। रामधारी सिंह दिनकर पर भी गाँधीवादी दर्शन का विशेष प्रभाव है। दिनकर जी ने कुरुक्षेत्र में गाँधीवादी सेवा भावना को महत्व दिया । यथा:- –
“जाओं शामिल करों, निज तप से नर के रागानल को बरसाओ पीयूस करो अभिषिक्त प्लीज दग्ध भूतल को । ”
हिंदी कथा साहित्य में प्रेमचंद्र की कई रचनाओं मैं गांधी जी के विचारों का दर्शन मिलता है। प्रेमचंद के उपन्यास- गबन, कर्मभूमि, सेवासदन तथा कायाकल्प में गाँधी जी के चिंतन के तत्थों का समावेश है। ऐस माना जाता है कि प्रेमचंद के पात्र सूरदास गाँधी जी के प्रतीक है। जैनेंद्र के मनोवैज्ञानिक उपन्यासों में गांधीजी के अहिंसा तथा संघर्ष की प्रेरणा को अभिव्यक्ति मिली है। फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास मैला आंचल में स्वराज की कल्पना में गांधीजी का प्रभाव दिखाई देता है। जयशंकर प्रसाद के नाटक में राष्ट्रीयता का जो स्वर है, वह भी गांधीवाद के प्रभाव के कारण है।
गांधीवाद में नैतिक मनुष्य ही वह धूरी है जिसके चारों ओर उनका समस्त चिंतन घूमता है। गांधीजी के अनुसार सत्य और अहिंसा पर आधारित व्यवस्था ही नैतिक और सर्वहिनकारी व्यवस्था होगी।
अतः कहा जा सकता है की हिंदी साहित्य में गांधीवादी विचारधारा में हिंदी साहित्य में सृजन की नई दिशाएं विकसित की है।

नाम- डॉ. रख्रीस्टी वाल्टर
विभाग- हिंदी
विषय- हिंदी साहित्य और गांधीवाद